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International Journal of Social Science and Education Research
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Vol. 7, Issue 2, Part I (2025)

विद्रोह (1857) के पूर्व झाँसी की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ

Author(s):

राकेश

Abstract:

बुन्देलखण्ड का झाँसी क्षेत्र अपने भौगोलिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टताओं के कारण सदियों से ऐतिहासिक चर्चाओं का केंद्र रहा है। यद्यपि इस क्षेत्र में कई रियासतें एवं मराठा शासन का प्रभाव रहा, फिर भी यहाँ के कृषक, शिल्पकार एवं भूमिहीन समुदाय सदैव अभावग्रस्त रहे। अध्ययन का उद्देश्य झाँसी और बुन्देलखण्ड की राजनीतिक स्थिति, मराठों एवं अंग्रेजों के मध्य शक्ति-संतुलन, तथा रानी लक्ष्मीबाई और वीरांगना झलकारी बाई की निर्णायक भूमिका का विश्लेषण करना है।
इस शोध में ऐतिहासिक दस्तावेजों, लोककथाओं, प्रशासनिक अभिलेखों एवं जनश्रुतियों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है। इस पद्धति से प्राप्त तथ्यों के आधार पर क्षेत्र में मुगल शासन के पतन, मराठा शक्ति के उत्थान–पतन, तथा ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा अपनाई गई “हड़प नीति” के परिणामों को स्पष्ट किया गया है। सन् 1804 की संधि से लेकर 1854 में झाँसी के अधिग्रहण तक की राजनीतिक घटनाएँ बताती हैं कि अंग्रेजों ने किस प्रकार सैन्य शक्ति, कूटनीति, फूट डालो नीति और आर्थिक दबाव के माध्यम से सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड पर नियंत्रण स्थापित किया।
परिणामस्वरूप झाँसी रियासत में असंतोष, विद्रोह और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी, जिसके बीच रानी लक्ष्मीबाई ने सैन्य संरचना, स्त्री-सैनिक दल और दुर्ग-रक्षा को संगठित किया। झलकारी बाई जैसी दलित वीरांगना का उदय सामाजिक-सैन्य इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुआ, जिसने संकट की घड़ी में रानी की रक्षा हेतु असाधारण साहस और बलिदान का परिचय दिया।
निष्कर्षतः यह अध्ययन दर्शाता है कि 1857 का महासंग्राम केवल “सिपाही विद्रोह” नहीं था बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रतिरोध का संगठित रूप था, जिसमें झाँसी तथा उसकी वीरांगनाओं ने भारतीय स्वतंत्रता-चेतना को निर्णायक दिशा प्रदान की। झलकारी बाई का त्याग और रानी लक्ष्मीबाई का नेतृत्व बुन्देलखण्ड के इतिहास को राष्ट्रीय गौरव के रूप में स्थापित करता है।

Pages: 754-758  |  71 Views  31 Downloads


International Journal of Social Science and Education Research
How to cite this article:
राकेश. विद्रोह (1857) के पूर्व झाँसी की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियाँ. Int. J. Social Sci. Educ. Res. 2025;7(2):754-758. DOI: 10.33545/26649845.2025.v7.i2i.435
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