एकता रानी
सांस्कृतिक विस्थापन केवल भौगोलिक स्थानांतरण से जुड़ा नहीं है, बल्कि यह मूल्यों, रीति-रिवाजों, भाषा, और जीवनशैली में आने वाले उन परिवर्तनों को भी दर्शाता है जो किसी व्यक्ति या समुदाय को उसकी जड़ों से दूर करते हैं। इक्कीसवीं सदी के हिंदी उपन्यासकारों ने इस जटिल प्रक्रिया को गहराई से चित्रित किया है। वे दिखाते हैं कि कैसे महानगरों की चमक-धमक गाँव की सादगी को निगल रही है, और कैसे पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव भारतीय परंपराओं को हाशिए पर धकेल रहा है। सांस्कृतिक विस्थापन के क्या कारण हैं। बाजारवाद की संस्कृति ने उपभोग को जीवन का केंद्र बना दिया है, जिससे पारंपरिक मूल्यों का स्थान व्यावसायिकता ने ले लिया है। मीडिया और इंटरनेट ने दुनिया को एक छोटे से गाँव में बदल दिया है, जिससे वैश्विक संस्कृति का प्रभाव तेजी से फैल रहा है। इन सभी कारणों ने मिलकर भारतीय समाज में एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, जहाँ लोग न तो पूरी तरह से अपनी जड़ों से जुड़े हैं और न ही पूरी तरह से नई संस्कृति को अपना पा रहे हैं।
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