श्याम मूर्ति भारती
औपनिवेशिक भारत में ब्रिटिश शासन की राजस्व नीतियों ने भारतीय ग्रामीण समाज की संरचना को गहराई से प्रभावित किया। 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दीवानी प्राप्त करने के बाद भूमि राजस्व ही सरकार की सबसे प्रमुख आय का स्रोत बन गया। स्थायी बंदोबस्त, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी जैसी व्यवस्थाओं ने जहाँ औपनिवेशिक शासकों के हित सुरक्षित किए, वहीं किसान वर्ग को अत्यधिक शोषण और निर्धनता के गर्त में धकेल दिया। इन नीतियों ने किसानों को भूमि से वंचित कर महाजनी शोषण, ऋणग्रस्तता और अकाल की भयावह परिस्थितियों में पहुँचा दिया। इसके प्रतिकार स्वरूप अनेक किसान आंदोलन हुए—जिनमें नील विद्रोह, दक्कन दंगे, पाइक विद्रोह, और बाद में अवध तथा बिहार के किसान आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। इस शोधपत्र में औपनिवेशिक राजस्व नीतियों का क्रमबद्ध विश्लेषण करते हुए उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभाव और परिणामस्वरूप हुए किसान आंदोलनों का ऐतिहासिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है।
Pages: 94-100 | 405 Views 231 Downloads